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Monday, May 4, 2020

अमर किसान

मुबारकों तुमको तुम्हारा स्वर्ग, जन्नत।
मैंने तो रेत से रेत मिलाई, बस रेत से प्रीत लगाई।

ना घनघोर काली रातों में आत्मा घबराई।
ना सर्दी की सिकुड़न, ना गर्मी की तपन शरीर थका पाई।1

मेरे पांव तले है सांप और बिच्छू है कांटों की भरमार।
तकदीर बताने वाली लकीरें है हजार, पर निकली सब बेकार।

मेरे लिए तो मेरा शरीर और मेरी आत्मा मेरे खेत की रेत है।
मैंने तो बस रेत से रेत मिलाई, बस रेत से प्रीत लगाई।

जिस पक्षी और परिंदे ने मुझे गीत सुनाई
मैंने तो उसकी भी किमत चुकाई।

कहते है भगवान तू, पर किसी ने इंसान बताने की हिम्मत नहीं दिखाई।
मैंने तो बस रेत से रेत मिलाई, बस रेत से प्रीत लगाई।

अंग्रेजों का कागत दिखाकर, मेरा स्वर्ग उजाड़ जाते हो।
सिमेन्ट का जंगल बसाते हो, फिर भी इंसान कहलाते हो।

जिस मिट्टी में फसल उगाई, उसकी प्यास मैने अपने पसीने से बुझाई।
इसलिए लिए मेरी जात शुद्र बताई और मुझको मेरी औकात दिखाई।

मुबारकों तुमको तुम्हारा स्वर्ग, जन्नत।
मेरे लिए तो मेरा शरीर और मेरी आत्मा मेरे खेत की रेत है।
मैंने तो रेत से रेत मिलाई, बस रेत से प्रीत लगाई।

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