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Thursday, September 26, 2013

मजबूरी का फायदा हर कोई उठाता है

 भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां की आधी से अधिक आबादी दूरदराज के गांवों खेतों और ढांणियों में निवास करती है। कहने को तो सरकार से लेकर बुद्धिजीवी व आम आदमी किसान को अन्नदाता कहते हैं, लेकिन असल में उसकी घोर उपेक्षा असहनीय स्त्तर पर पहुंच गई हैं, इसका खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ेगा। उन तक महत्वपूर्ण खेती-बाड़ी व अन्य तमाम विषयों की नवीनतम जानकारियां देने का जिम्मा सूचना और प्रसारण तथा जनसम्पर्क के माध्यमों को सौंपा गया है। एक तरफ हम विश्व स्तरीय प्रतिस्पर्धा की बात करते है दूसरी तरफ?
भारत में कृषि लगातार पिछड़ती ही जा रही है। क्योंकि भारत में कृषि को उद्योग का दर्जा नहीं मिला है। परन्तु नाचने-गाने वाले बॉलीवुड को उद्योग का दर्जा मिला हुआ है, यह उद्योग इतना विकसीत हो चुका है कि अय्यास व विलासी जीवन, देह व्यापार, माफिया, सट्टेबाज, आंतकी, डॉन, नशे के व्यापारी पूरी दूनियां में अपनी चमक-धमक को शान से दिखा रहे है। प्रतियोगी परीक्षाओं में जिस्म-2 में काम करने वाले अभिनेता व अभिनेत्री कौन है? पुछा जाता है। भारतीय सीमा में घुसपैठ करते पकड़े गये तीन चीनी घुसपैठियों ने इसका मजाक उड़ाया और कहा कि फिल्मों में भारत की समृद्धि देख भारत आना चाहते थे। सच्चाई यह है कि कृषि को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चंगुल में फसाया जा रहा। कृषि विशेषज्ञ कई बार एक नए रसायन के बाजार में आने का नाम लेते हैं। साथ में यह बताते हैं कि बाजार में उपलब्ध हो तो इसका प्रयोग करें। इसकी मात्रा थोड़ी-सी डालना क्यांकि यह महंगा है। आजकल कृषि सलाहकार कम्पनियों के सैल्समेन बन गये है। नकली व गुणवत्ताहीन पेस्टीसाईड-बीज खुल्ले आम बेचे जा रहे है। सरकार ने लीफकर्ल वायरस से मुक्त किस्मों को ही बाजार में जारी करने का निर्देश दिया है परन्तु कृषि सलाहकार सिफारिश कई किस्मों के बीजों की कर देते है और किसान भ्रम में रह जाते है।
कृषि उत्पादों का मूल्य भी उचित नहीं मिलता ।
उदाहरण - गेहूं उत्पादन करना क्या अपराध है? आज बाजार में चाय का कप 8 से 10 रूपये मिलता है। वह भी आदमी को बीस मिनट तक ही ऊर्जा या ताजगी दे पाता है (या यह भी एक भ्रम ही है)। दूसरी तरफ किसानों द्वारा उत्पादित गेहूं की केवल डेढ़ सौ ग्राम मात्रा केवल दो रूपये की है और सारा दिन आदमी को पूरी ऊर्जा प्रदान करती है। इतना सस्ता उत्पाद और इसे बेचने के लिए जमाबंदी व गिरदावरी की शर्त? साथ में फोटो पहचान पत्र? जिन किसानों ने जमीन ठेका या हिस्सा पर ले रखी है, उनकी तो हालत और भी बुरी है। संयुक्त परिवारों के चलते भूमि पुराने रिकॉडों में बुजुर्गो के नाम दर्ज है, उसमें भी परेशानी।
राजस्थान में गेहूं पर बोनस - राजस्थान सरकार ने किसानों को गेहूं पर बोनस के रूप में दो सौ करोड़ रूपये की व्यवस्था की थी। राजस्थान में पेस्टीसाइड पर 5 प्रतिशत वैट लगता है जबकि हरियाणा-पंजाब में पेस्टीसाईड पर वैट नहीं लगता। वैट से प्राप्त राशि दो सौ करोड़ से अधिक होती है फिर दौ सौ करोड़ रूपये बोनस के रूप में देने की घोषणा का क्या औचित्य रहा? किसानों को समय पर भुगतान भी नहीं हो पाया जिसके कारण नरमें की फसल के लिए उधार बीज लेना मजबूरी बन गया। उधार में 99 प्रतिशत दुकानदार नकली बीज ही देते है।
कृषि भूमि तो अंग्रेजों के जमाने से हड़पी जा रही है वर्तमान में भूमि हड़पना आम हो चुका है ।
कृषि विकास के नाम से योजनाएं चलाई जाती है जो सिर्फ घोटोलों की जनक। जबकि कृषि को सबसे पहले उद्योग का दर्जा मिले व विकास के लिए कोई योजना न चलाकर कानून बनाया जाना चाहिए। कानून से ही सभी सुविधाओं का लाभ किसानों को मिलेगा । योजनाएं तो घोटले व खाना पूर्ति का माध्यम बन कर रह गई है जिनका लाभ राजनैतिक पार्टियों के नेता व नजदीकी उठा रहे है। विज्ञापनों के माध्यम से पार्टी व खुद का प्रचार करना इनका प्रमुख उद्देश्य रह गया है। किसान अपनी हालात पर मजबूर है और मजबूरी का फायदा हर कोई उठाता है। सरकार और समाज के पास किसान की इन तमाम समस्याओं का हल है?

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